एसडीपीआई का बड़ा बयान – मस्जिद की जमीन पर मंदिर बनाना संवेधानिक मूल्यों पर हमला

अयोध्या में होने जा रहे राम मंदिर निर्माण के भूमिपूजन को सोशल ड्रेमोंक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने संवेधानिक मूल्यों पर हमला करार दिया। एसडीपीआई अध्यक्ष ने बयान जारी कर कहा कि बाबरी मस्जिद को बलपूर्वक तोड़ा गया और उस जमीन पर राम मंदिर का निर्माण अनैतिक है, गैरकानूनी है और भारत के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को सीधी चुनौती है।

एमके फेजी ने कहा कि बाबरी मस्जिद आरएसएस के लिए लंबे समय से राजनीतिक हथियार रहा है और राम मंदिर के नाम पर धार्मिक भावनाओं को भड़का कर भाजपा केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई है। अपने दूसरे कार्यकाल में बीजेपी ने सभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष तंत्रो का भगवाकरण किया ताकि मस्जिद की जमीन पर मंदिर बनाने के मंसूबों का कोई विरोध न कर सकें।

बाबरी मस्जिद मामले में दिये गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को विधि विशेषज्ञों ने पहले ही अन्यायपूर्ण करार देते हुए खारिज कर दिया। फैसले के सूचीबद्ध तथ्यों के खिलाफ जाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद की जमीन को मंदिर निर्माण के लिए सौंप दिया। इस दौरान उन्होने कांग्रेस की भी आलोचना की। उन्होने कहा, कांग्रेस ने पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अन्यायपूर्ण करार देते हुए निंदा की थी लेकिन आज बढ़चढ़ कर बीजेपी की होड कर रही है। फेजी ने कहा कि अब कांग्रेस नेता भूमिपूजन में न बुलाए जाने को लेकर नाराज है।

बता दें कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने भी राम मंदिर के निर्माण के लिए दिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘अन्यायपूर्ण और अनुचित” बताया। बोर्ड ने कहा कि ‘बाबरी मस्जिद थी और हमेशा मस्जिद ही रहेगी। हागिया सोफिया इसका एक बड़ा उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टिकरण निर्णय द्वारा जमीन पर पुनर्निमाण इसे बदल नहीं सकता है। दुखी होने की जरूरत नहीं है। कोई स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती है।’

संगठन के महासचिव मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने कहा, “हमने हमेशा कहा है कि बाबरी मस्जिद को कभी भी किसी मंदिर या किसी हिंदू पूजा स्थल को ध्वस्त करके नहीं बनाया गया था।” उन्होंने आगे कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है कि मस्जिद में 22 दिसंबर, 1949 को मूर्तियों को रखना एक गैरकानूनी कार्य था।

कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी स्वीकार किया है कि 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक गैरकानूनी, असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य था। इन सभी तथ्यों को स्वीकार करने के बाबजूद एक बेहद अन्यायपूर्ण फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद की जमीन को उन लोगों को सौंप दिया, जिन्होंने एक आपराधिक तरीके से मस्जिद में मूर्तियों को रखा था और इस आपराधिक विध्वंस के पक्षकार थे।”


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