अफगानिस्तान पर बदली भारत की विदेश नीति, अमेरिका और तालिबान समझौते में होगा शामिल

करीब दो दशकों से जारी हिं’सा को रोकने के लिए अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते के लिए मंच तैयार है। शनिवार को खाड़ी देश कतर की राजधानी दोहा में समझौते पर दस्तखत होंगे। जिसमे पाकिस्तान प्रमुख पक्ष है, इसलिए प्रधानमंत्री इमरान खान गुरुवार को कतर पहुंच गए।

एक अफगान अधिकारी ने एएफपी को बताया कि कतर की राजधानी में शनिवार (29 फरवरी) को समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान 30 देशों का प्रतिनिधित्व होने की उम्मीद है। हालांकि, अफगानिस्तान सरकार अपना प्रतिनिधि नहीं भेजेगी। अधिकारी ने कहा, ”हम इन वार्ताओं का हिस्सा नहीं हैं। हम तालिबान पर भरोसा नहीं करते हैं।”

वहीं कतर ने समझौता समारोह में भारत को आमंत्रित किया है और अब उसमें दोहा में मौजूद भारतीय राजदूत पी कुमारन शिरकत करेंगे। यह पहला मौका होगा जब भारत तालिबान को मान्यता देने वाले किसी आयोजन में शिरकत करेगा।  इस समझौते से 2001 से अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिका के 14 हजार सैनिकों की वापसी का रास्ता साफ होगा।

19 साल से जारी संघर्ष में अमेरिकी सेना अपने 2,400 सैनिकों की जान गंवा चुकी है। यह अमेरिका के लिए सबसे लंबा युद्ध साबित हुआ है जिसमें अमेरिका को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है।  वर्ष 2016 के राष्‍ट्रपति चुनाव में डोनाल्‍ड ट्रंप ने वादा किया था कि यदि वे सत्‍ता में आए तो अफगानिस्‍तान से अपनी फौज को वापस बुला लेंगे। इसका उन्‍हें समर्थन भी मिला था।

इस बाबत अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर का कहना है कि अमेरिका भारत की चिंताओं से अवगत तो है लेकिन यहां पर उसकी अपनी मजबूरी काफी बड़ी है। तालिबान का यहां पर दोबारा काबिज होना क्षेत्रीए सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा है।

इसके अलावा वे भी मानती हैं कि अफगानिस्‍तान से अपनी फौज को हटाने क लिए ट्रंप तय दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भारत को ये सुनिश्चित करना होगा कि यदि ये समझौता होता है तो क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे में न पड़ने पाए। इसके अलावा अमेरिका को ये भी देखना होगा कि उनके वहां के चले जाने से वहां पर एक शून्‍य न बन जाए। यदि ऐसा हुआ तो तालिबान वहां पर हावी हो जाएगा और हालात फिर से खराब हो जाएंगे।


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