Home विचार आर एस टी वी – विशाखा ! यहाँ कौन है तेरा…

आर एस टी वी – विशाखा ! यहाँ कौन है तेरा…

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निर्भया मामले के बाद से राज्यसभा में एक के बाद एक सदस्यों ने देश के विभिन्न हिस्सों में महिला सुरक्षा और उत्पीड़न के मुद्दे की तरफ सरकारों की तवज्जो दिलाने के लिए काफी हो-हल्ला किया। वर्तमान सत्र के दौरान भी इस मुद्दे पर कई सदस्य बहुत मुखर रहे हैं। समाजवादी पार्टी की जया बच्चन ने करीब-करीब हर दिन चेयरमैन का ध्यान इस ओर खींचने की पूरी कोशिश की है। अभी 25 जुलाई 2018 को भी उन्होंने कांग्रेस की कुमारी सेलजा के महिला सुरक्षा मुद्दों पर मोरनी बलात्कार का हवाला देते हुए विशेष उल्लेख में अपनी आवाज़ मिलायी। अगले ही दिन सदन में विपक्ष के नेता

गुलाम नबी आजाद ने देश में महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर ध्यान देने की सरकार से मांग की। लेकिन मीडिया में महिला उत्पीड़न के मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त करने वाले उच्च सदन में इन सांसदों की नज़र अपने ही घर में एक ऐसे ही मामले से अनजान लगती है। जी हाँ! राज्यसभा सचिवालय में एक उत्पीड़न का एक गंभीर विवाद जारी है जहां कुछ महिलाएं अपने सम्मान की लड़ाई में ताकतवर और मोर्चाबंद लोगों का सामना कर रही हैं।

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मामला कुछ जूनियर महिला कर्मचारियों द्वारा दायर एक उत्पीड़न की शिकायत से संबंधित है, जिसमें एक वरिष्ठ अधिकारी राजेश बादल (अब पूर्व अधिकारी) के खिलाफ प्रशासन को गयी उत्पीड़न की शिकायत का है। इस बारे में सूत्रों का कहना है कि इन महिला कर्मचारियों द्वारा कई बार मौखिक शिकायत के बाद लिखित रूप में अपनी शिकायत जमा करने के लिए कहा गया था, जो उन्होंने दिसंबर 2017 में प्रशासन को दे दी।  लेकिन इसके बाद किसी भी राहत या सुरक्षा पाने के बजाय वास्तव में शिकायतकर्ताओं को और शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। संबंधित सभी पार्टियां राज्यसभा टेलीविजन (आरएसटीवी) में काम कर रही हैं, जो कि राज्य सभा सचिवालय की ही एक इकाई और सीधे सभापति के नियंत्रण में काम करती है।

गौरतलब यह है कि मौखिक शिकायत करने के बाद न आरोपी व्यक्ति को  आरएसटीवी परिसर से दूर किया गया और न ही आरोपित व्यक्ति को शिकायतकर्ताओं से संपर्क  आशंका से सुरक्षा दी गई। इस दौरान हर समय आरोपी न सिर्फ वर्तमान परिसर में बना रहा लेकिन वास्तव में दफ्तर में नियमित काम के नाम पर शिकायतकर्ताओं के से मिलते रहने के लिए पूरी तरह आज़ाद भी रहा। अधिकारियों को लिखित शिकायत मिलने के बाद भी ये हालात जस के तस बने रहे। एक संस्थान में महिला सुरक्षा की जानिब अपनाए गए ज़बरदस्त असंवेदनशील दृष्टिकोण का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है।

इस शिकायत को सुनने के लिए बनाई गयी ‘आंतरिक शिकायत समिति’ का गठन भी अधिकारियों के दोषपूर्ण रवैये और प्रशासनिक अधिकार के बेजा इस्तेमाल की ही एक कहानी है। आरएसटीवी द्वारा गठित शिकायत समिति में चैनल के कर्मचारियों के अलावा एक बाहरी सदस्य शामिल किया गया था। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, सिवाय इसके कि चैनल के भीतर से लिए गए  समिति के सभी सदस्य आरोपी की तुलना में दो या तीन ये भी अधिक जूनियर स्तर के थे और संगठन में कई साल से आरोपी के मातहत काम कर रहे थे।

शिकायत दर्ज होने के समय राजेश बादल आरएसटीवी में कार्यकारी निदेशक के रूप में काम कर रहे थे। सीईओ-प्रधान संपादक (सीईओ-ईएनसी)  के बाद चैनल में यह दूसरा सबसे बड़ा पद है। और शिकायत दर्ज करने के समय आरएसटीवी के पास कोई पूर्णकालिक  सीईओ-ईएनसी नहीं था। प्रसार भारती  सीईओ को फौरी तौर पर  आरएसटीवी  का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था और प्रधान संपादक का पद खाली था। फ़िलहाल मौजूदा हालात ने बादल को व्यवहारिक कार्यालय प्रमुख (एचओपी) बना दिया। ऐसे में आरएसटीवी के भीतर हर गतिविधि न सिर्फ बादल की जानकारी में थी बल्कि सारे काम उसके पर्यवेक्षण किये जाते थे। इसलिए मान लेना चाहिए कि आंतरिक शिकायत समिति के सदस्य  के नाम-पद की जानकारी भी राजेश बदल को थी।

कार्यालय प्रमुख के रूप में अपने काम-काज के अमल जारी रखने के चलते बादल को शिकायतकर्ताओं  साथ शिकायत समिति के प्रत्येक आंतरिक सदस्य तक पहुंच-पैठ मिली रही। समिति की अध्यक्षता नीलु व्यास थॉमस ने की थी, जो एक असोसिएट कार्यकारी निर्माता है और आरोपी से चार स्तर निचले पद पर कार्यरत है।

शिकायतकर्ताओं की मानसिक स्थिति और आघात का अंदाजा लगाएं कि उनकी शिकायत के बावजूद आरोपी दफ्तरी काम के नाम पर ‘नियमित और स्वतंत्र रूप से’ उनसे संपर्क बनाये रखने के लिए अधिकृत था। और यह बात शिकायत समिति द्वारा दायर की गई रिपोर्ट में भी दिखाई देती है। समिति की रिपोर्ट कहती है कि शिकायतकर्ताओं ने लिखित शिकायत करने  कुछ दिन बाद अनुरोध किया कि उनकी शिकायत अब केवल “चिंता” के रूप में माना जाए। ये वही समय है जबकि शिकायत करने के बाद शिकायतकर्ता रोज़ उसी दफ्तर में रोज़  आरोपी से मिलने को मजबूर थे। हालांकि समिति द्वारा ये “अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया” था जो कार्यस्थल (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 अध्याय IV, 10 (1) में महिलाओं के यौन उत्पीड़न का उल्लंघन है, जो कहता है कि “आंतरिक समिति या, स्थानीय समिति, जैसा मामला हो, धारा 11 के तहत जांच शुरू करने से पहले और पीड़ित महिला के अनुरोध पर समझौते के माध्यम से उसके और उत्तरदाता के बीच मामला सुलझाने के लिए कदम उठा सकती है। “

तो उसके बाद क्या हुआ। मार्च 2018 से जब राहुल महाजन ने आरएसटीवी के प्रधान संपादक के रूप में पदभार संभाला, तब से चीजें तेजी से बढ़ने लगीं। नए संपादक के निर्देश पर लंबित मामले को हल करने के लिए समिति की बैठक जल्दी- जल्दी हुईं। समिति ने अप्रैल 2018 में बैठक की और शिकायत को ये कह कर ख़ारिज कर दिया की यह देर से दिए जाने के कारण यह ‘समय-बाधित’ (टाइम बार्ड) है और इसका संज्ञान नहीं लिया जा सकता और शिकायत को खारिज कर दिया। लेकिन इसके साथ ही समिति ने न सिर्फ एक एक लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट पेश कर दी बल्कि आरोपी को पाक-साफ़ बताते हुए शिकायतकर्ताओं के खिलाफ एक्शन लेने की भी सिफारिश कर दी।

विशाखा अधिनियम के मामले में शायद ये पहला, और उम्मीद करनी चाहिए कि आखिरी भी, मामला होगा जहाँ शिकायत तो सुनी नहीं जा सकती लेकिन उस पर फैसला दिया जा सकता है।

समिति की सिफारिश है कि शिकायतकर्ताओं को, और भविष्य में किसी अन्य को भी, विशाखा अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग करने से रोकने के लिए कड़ा सज़ा मिलनी चाहिए। इसके लिए समिति ने  कार्यस्थल महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की धारा 14 का हवाला दिया है जो स्पष्ट रूप से ‘गलत या दुर्भावनापूर्ण’ शिकायत से संबंधित है।

इसका प्रभावी अर्थ यह है कि शिकायत को खारिज करने के बावजूद शिकायत समिति ने ‘टाइम-बार्ड’ शिकायत को झूठी और दुर्भावनापूर्ण घोषित कर दिया है और इसके आरोपी का दामन पाक-साफ़ कर दिया है। लेकिन ऐसा करने में शिकायत समिति ने उसी धारा का उल्लंघन किया है जिसको उनहोंने सिफारिश का आधार बनाया है।

कार्यस्थल महिला यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की धारा 14(1) अनुच्छेद 3 कहता है, “…  बशर्ते कि शिकायतकर्ता के पर दुर्भावनापूर्ण इरादे की किसी भी कार्रवाई की सिफारिश करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच के बाद इसकी सत्यता स्थापित की जाएगी”।

लेकिन  आरएसटीवी की शिकायत समिति ने ज़बर्दस्त कानूनी बूझ का मुज़ाहिरा करते हुए एक ओर शिकायत की स्वीकार्यता को ही ख़ारिज कर दिया लेकिन बिना किसी सुनवाई के शिकायत पर रिपोर्ट दे दी, आरोपी को मुक्त कर दिया और शिकायतकर्ताओं को सज़ा । यानि बिना तीर चलाये तीन-तीन शिकार।  और इस प्रक्रिया में उन्होंने राजेश बादल सहित उनके समक्ष प्रत्येक बयान को अपना लिया यानि रिपोर्ट का हिस्सा बना दिया है।  अपने बयान में बादल ने  दावा किया है कि इस शिकायत के चलते उन्हें आरएसटीवी के कार्यकारी निदेशक के पद से इस्तीफा देने के लिए उन पर दबाव बनाया गया था। तो क्या अब इस आरोप की जांच नहीं होनी चाहिए?

शिकायतकर्ताओं की ओर संवेदनशीलता की उपेक्षा समिति की पूरी कार्यवाही में दिखाई देती है। समिति को पहले शिकायत की स्वीकार्यता का पता लगाना चाहिए था और फिर इसकी सच्चाई की जांच करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए था। जबकि समिति ने मानदंडों को अनदेखा कर विशाखा अधिनियम के एकमात्र उद्देश्य को, जो कि महिलाओं को कार्यस्थलों पर संरक्षित करना है न कि उन्हें बदनाम करना, तार-तार कर दिया।

समिति ने शिकायत की स्वीकार्यता के फैसले के पर्दे में छुपा कर शिकायत की योग्यता की जांच कर डाली। अविश्वसनीय रूप से कुछ बैठक के बाद समिति ने “टाइम बार्ड” होने के लिए शिकायत को “अस्वीकार कर दिया”। फिर भी वे न केवल शिकायतकर्ताओं बल्कि गवाहों और यहां तक कि आरोपी की जांच करने में कामयाब रहे। ये उन्होंने कैसे किया, यह विशाखा अधिनियम से संबंधित मामलों में काम करने वाले सभी लोगों के लिए एक सबक होना चाहिए। और कानून के इस तरह की व्याख्या को विशाखा अधिनियम के इतिहास में ब्यौरेवार दर्ज किया जाना चाहिए।

लेकिन यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि शिकायत समिति की रिपोर्ट “सर्वसम्मति से नहीं है”। समिति के कम से कम एक सदस्य प्रक्रिया से असहमत हैं। सदस्य का विरोध यह है कि अगर समय बाधित होने के लिए शिकायत खारिज कर दी जाती है तो गवाहों और आरोपी की जांच साथ शिकायत पर सिफारिश समिति के अधिकार से परे है। लेकिन नक्कारख़ाने में तूती कौन सुने ! कुछ और घटनाएं भी हैं जो इन समिति की कार्यवाही के साथ-साथ सामने आई हैं।

आरएसटीवी में सत्ता के बदलाव के बाद ये सभी गतिविधियां शुरू हुईं। कुछ चीज़ें मीडिया में भी दिखाई दीं कि कुछ ख़ास लोगों को चैनल से बाहर किया जा रहा है। (https://www.bhadas4media.com/rajya-sabha-tv/)। इनमें राजेश बादल का भी एक विशेष मामला था। वास्तव में उन्होंने समिति के सामने अपने बयान में दावा किया है कि इस शिकायत के कारण इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उनका बयान समिति की रिपोर्ट में रिकॉर्ड का मामला है और गौरतलब है कि उन्होंने जनवरी 2018 के अंत में इस्तीफा दे दिया था, जो उनके पोस्ट में ऑनलाइन पोर्टल में साझा हुए थे (https://www.bhadas4media.com/rajesh-badal-ke -rstv-se-esteefa /), (http://www.indialegallive.com/media-watch/media-watch-latest-happenings-in-the-corridors-of-journalism-4-43399)

तो क्या यह वक्त नहीं है कि राज्यसभा की महिला सदस्य एक सांसद समिति बनाने और इस मुद्दे की पूरी तरह से जांच करने के लिए मिलकर पहल करें? आखिरकार अगर ये भी मान ले  कि ऐसे गंभीर मामलों की जानकारी सांसदों को न मिलना  विशेषाधिकारों की बात नहीं तो भी ये सदन की प्रतिष्ठा भी तो असरअंदाज़ करता है। ख़ासकर तब जब आये दिन सांसद सदन में महिला सुरक्षा के मुद्दों पर लगातार  सवाल कर रहे हों।

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