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प्रशांत टंडन: कर्नाटक से आगे का रास्ता सिर्फ ‘जन आंदोलन’

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प्रशांत टंडन

मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में जिस राह पर बीजेपी चली उस पर आज कर्नाटक ने भी मुहर लगा दी. निश्चित तौर पर नतीजे चौकाने वाले हैं और देश में स्वस्थ्य और संवैधानिक लोकतंत्र के चाहने वालों के लिये दुखद भी हैं. इन नतीजों ने एक बात और बता दी है कि आने वाले दिन और ज्यादा चुनौती भरे होंगे और समाज के भीतर और भी ज्यादा काम करने की ज़रूरत है.

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एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसकी आर्थिक, विदेश, सामरिक और भ्रष्टाचार से लड़ने की सभी नीतियां विफल हों और वो झूठ, बड़बोले पन और लगभग गाली गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल चुनावी रैलियों में करे और लोग उसे जिता भी दें इसी से अंदाज़ लगाना चाहिये कि बीमारी किस हद तक बढ़ गई है. इन सबके बीच कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों की इस बात की तो तारीफ करनी चाहिये की तालियाँ पिटवाने के लिये और वोटरों को रिझाने के लिये इन्होने अभी आपा नहीं खोया है. राहुल गांधी, अखिलेश, मायावती, स्टालिन, यचूरी, देवगौड़ा, ममता और तेजस्वी किसी के भी गलीज़ भाषा में बयान नहीं आते हैं जिस भाषा-शैली का इस्तेमाल मोदी बेधड़क करते हैं.

आगे का रास्ता सिर्फ जन आंदोलन है:

देश का संविधान और लोकतंत्र सिर्फ कांग्रेस की देन नहीं है इसे देश की जनता ने अपने लिये एक लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है और इसे बचाने की ज़िम्मेदारी भी जनता की है और इस लड़ाई को कांग्रेस को आउटसोर्स करके बैठ जायेंगे तो सब कुछ गंवा देंगे.

बीजेपी – आरएसएस समाज को बांटने का अभियान लगातार चलाते हैं. सवर्ण तबका जिसकी मौजूदगी मीडिया और समाज में राय बनाने के इदारों में बड़े पैमाने पर है वो बीजेपी के लिये साल भर खुले रूप से प्रचार में लगा रहता है. इसका जवाब वो राजनीतिक पार्टियां तो बिलकुल भी नहीं दे सकती हैं जो सिर्फ चुनाव की गणित के हिसाब से मतदान के कुछ दिन पहले ही काम करना शुरू करती हैं – इस काम को जन आंदोलनो में लगे लोगो को अपने हाथ में लेना होगा.

समाज में मूल्यों की गिरावट आती है तो सभी जाति धर्म के लोगो को लगभग बराबर तरह से प्रभावित करती है – ऐसे माहौल में समाज के एक तबके को मोदी जैसे नेता के संदेश अच्छे लगेंगे.

देश व्यापी जन चेतना अभियान से सामाजिक मूल्यों के इस दोष को ठीक किया जा सकता है.

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