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Monday, November 29, 2021

जामिया महज़ एक यूनिवर्सिटी नहीं बल्कि ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ संघर्षों की मुकम्मल तारीख़

डॉक्टर जाकिर हुसैन ने 1938 में जामिया के स्थापना के उद्देश्यों के बारे में कहा था कि “जामिया का मुख्य उद्देश्य भारतीय मुसलमानों के भविष्य के जीवन के लिए इस तरह के एक रोडमैप को विकसित करना है जो इस्लाम के चारों ओर घूमता हो और भारतीय संस्कृति के ऐसे रंगों से मिला जुला हो जो वैश्विक मानव सभ्यता के साथ मेल खाता हो”।

पर आज इतने साल बीतने के बाद उन तमाम उद्देश्यों को दफ़्न कर दिया गया जिसकी वजह से इसकी बुनियाद डाली गई थी। नाम निहाद सेक्युलर दलों ने भी इसे हमेशा तिरछी नज़र से देखा इसके साथ भेदभाव किया। वामपंथ ने इसकी बुनियाद जिसमें इस्लामी तहज़ीब दौड़ती थी उसको ख़त्म करने की पूरी कोशिश की तो आज संघी खेमा इसे जड़ से मिटाने की फ़िराक़ में लगा है।

ख़ैर, जामिया महज़ एक यूनिवर्सिटी ही नहीं है ये ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ संघर्षों की एक मुकम्मल तारीख़ का नाम है, इसकी बुनियाद की ईंटों में स्वतंत्रता सेनानियों का ख़ून और पसीना शामिल है, ख़िलाफ़त मूवमेंट की हर वो आवाज़ शामिल है जो सर ज़मीन-ए-हिंद से उठती थी। ये अहल-ए-शौक़ की वो बस्ती है जिसकी किरणों से इस मुल्क ने हमेशा फ़ैज़ पाया है।

जामिया हर दौर में हुक्मरानों की आँखों में गड़ती रही है, अंग्रेज़ी हुकूमत में इसने हर ज़ुल्म सहा, मुल्क आज़ाद हुआ तो दंगाइयों ने इसे लूटा और जलाया। पर आज सत्तर साल बाद भी किसी को इसके नाम से नफ़रत है तो कोई इसके माईनोरिटी कैरेक्टर को लेकर हमेशा टारगेट करता रहता है।

जामिया जिसका एक गौरवशाली अतीत रहा है, एक राष्ट्रीय विरासत के तौर पर इतिहास में इसे शानदार जगह मिलनी चाहिए और ये एक शानदार भविष्य का हक़दार भी है। भारत को एक राष्ट्र बनाने के लिए जिन मुसलमानों ने अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया उन्हीं मुसलमानों की एक धरोहर है “जामिया मिल्लिया इस्लामिया”। अगर इसमें से इस्लाम को अलग कर दो तो फिर कुछ भी नहीं बचेगा।

ज़रूरत है जामिया में फिर से उसी इस्लामी तहज़ीब-ओ-शक़ाफत को ज़िंदा करने की जिसकी वजह से इसकी बुनियाद पड़ी थी वर्ना इसके स्थापना करने वालों के साथ ग़द्दारी होगी। महात्मा गांधी के साथ नाइंसाफ़ी होगी जो इस्लाम को इससे हमेशा जुड़ा हुआ देखना चाहते थे।

(ये लेख प्रोफेसर माजिद मजाज की फेसबुक पोस्ट से साभार लिया गया है)

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