अबू अशरफ: ‘इस्लाम में फितना की मनाही’

अबू अशरफ

इस्लाम हमेशा से शांतिपूर्ण और सौहार्द्यपूर्ण वातावरण बनाने के लिए सहिष्दुनता का मार्ग अपनाने का सन्देश देता है। कुरआन की आयतें “फितना (उत्पीड़न) रक्तपात से भी बुरा है” (2:217) और “अल्लाह के राह में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लडें किन्तु ज्यादती ना करो नि:सन्देह अल्लाह ज्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता” (2: 190) भी इसी शांति की परिचायिका है।

इस्लाम के साथ साथ सभी धर्मो की हिदायतों के हिसाब से अगर उत्पीडन हराम है तो सवाल उठता है की क्यों फिर पूरी दुनिया में आत्महत्या, बम विस्फोट और निर्दोष नागरिकों का नरसंहार जैसी घटनाएं घट रही है। चूँकि निर्दोष लोग, शान्ति के रक्षक होते हैं , इसलिए इस तरह की हत्या सभी धर्मो के पवित्र उपदेशों का उलंघन करती है। कुरान की आयतें “तुम उनसे लड़ो यहाँ तक की फितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए। अतः यदि वे बाज़ आ जाए तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी के विरुद्ध कोई कदम उठाना ठीक नहीं” (2:193) और “फिर यदि वे बाज़ आ जाये तो अल्लाह भी क्षमा करने वाला अत्यंत दयावान है” (2:192) भी अमन और शांति का सन्देश ही देतीं हैं।

बता दें की जिहाद का अर्थ युद्ध नहीं है बल्कि अल्लाह की मर्ज़ी को हर स्तर जैसे कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर लागू करने के लिए संघर्ष करना होता है। पैगम्बर मोहम्मद ने युद्ध से लौटते वक़्त अपने साथियों से कहा था की हम छोटे जिहाद (युद्ध) से बडे जिहाद (अपने समाज और लोगों के दिल से गलत काम निकालने का अधिक जरूरी और महत्वपूर्ण कार्य) की तरफ जा रहे हैं। रमजान के पाक महीने में सल्लालाहू अलैह वसल्लम की बातों पर अमल करके देश की तरक्की में अहम् अदा कर सकते हैं।


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