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एर्दोगान दे सकते है अमेरिका को झटका – ‘तुर्की नाटो से हो सकता है पूरी तरह अलग’

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अब्दुल बारी अतवान

बुधवार को तुर्की की राजधानी अंकारा में जो शिखर बैठक हुई उससे साफ़ हो गया है कि दो मामलों में रूस ने खुलकर तुर्की का समर्थन कर दिया है।

पहला मामला उत्तरी सीरिया में कुर्दों की अलग देश बनाने की योजना पर रोक लगाने से संबंधित है और दूसरा मामला आतंकवाद से संघर्ष की आड़ में अमरीका की सैनिक उपस्थिति पर अंकुश लगाने का है।

शिखर बैठक के बाद जो बयान जारी हुआ उसने तीनों ताक़तों के गठजोड़ को मज़बूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण औपचारिकताएं पूरी कर दी हैं तथा सीरिया ही नहीं बल्कि पूरे इलाक़े के लिए नया ख़ाका निर्धारित कर दिया है।

इसमें तो कोई शक नहीं है कि घोषणापत्र में उन सभी समझौतों का उल्लेख नहीं है जो तीनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच गुप्त रूप से हुए हैं, विशेष रूप से द्विपक्षीय बैठकों में जो सहमति हुई है उसका ब्योरा नहीं है लेकिन बैठक की समाप्ति पर जारी होने वाले बयान के अध्ययन से यह समझा जा सकता है कि तीनों देशों का स्ट्रैटेजिक गठबंधन मज़बूत और ताक़तवार होता जा रहा है और क्रूज़ मिसाइल की रफ़तार से आगे बढ़ रहा है। इसमें एक विश्व शक्ति रूस है और दो क्षेत्रीय ताक़तें ईरान और तुर्की हैं। इस गठबंधन का अब इलाक़े की शांत और लड़ाई में महत्वपूर्ण रोल होगा जबकि धीरे धीरे पुनः संभल रहे देशों सीरिया और इराक़ के लिए इस गठबंधन के दरवाज़े खुले हुए हैं।

बयान में कुछ बिंदुओं पर विशेष रूप से बल दिया गया है। पहली चीज़ तो यह है कि सीरिया में कुर्दों के अलगाववादी मंसूबे को पूरी तरह रोका जाना है। दूसरी बात क्षेत्र में आतंकवाद से लड़ाई की आड़ में कोई नया समीकरण पैदा करने के प्रयासों पर अंकुश लगाना है। यह सीधा इशारा अमरीका की वर्तमान सैनिक उपस्थिति और संभावित रूप से बाद में फ़्रांस की सैनिक उपस्थिति की ओर है। तीसरी चीज़ है सीरिया की राष्ट्रीय संप्रभुता और स्थिरता का सम्मान है।

अगर हम कुछ ब्योरे में जाएं तो यह कह सकते हैं कि रजब तैयब अर्दोग़ान ने अपना फ़ैसला ले लिया है और पूरी तरह अपने मित्र पुतीन के ख़ैमे में शामिल हो जाने का मन बना लिया है। उन्होंने रूस के साथ स्ट्रैटेजिक गठबंधन बनाने की फ़ैसला किया है और अमरीका, यूरोपीय देशों तथा नैटो से सामयिक रूप से ही सही मुंह फेर लेने की नीति बना ली है।

रूस ने जुलाई 2019 में तुर्की को एस-400 मिसाइल सिस्टम देने की घोषणा करके यह ज़ाहिर कर दिया है कि तुर्की ने अपनी स्ट्रैटेजी बना ली है और तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान अपने रूसी समकक्ष के साथ असामान्य सहमति बना चुके हैं संभावित रूप से इसमें सीरिया के बारे में भी कई समझौते हुए हैं जिनमें इदलिब और इफ़रीन के भविष्य का मामला भी शामिल हैं।

यह बात भी ध्यान योग्य है कि तुर्की के प्रतिनिधिमंडल में जिसका नेतृत्व राष्ट्रपति अर्दोग़ान ने किया, तुर्की की सत्ता के मूल स्तंभ समझे जाने वाले सभी अधिकारी शामिल थे। चीफ़ आफ़ आर्मी स्टाफ़ जनरल ख़ुलूसी आरकान, इंटैलीजेन्स प्रमुख जनरल हाकान फ़ीदान, रक्षा मंत्री नूरुद्दीन जानीक्ली, विदेश मंत्री मौलूद चावुश ओग़लू, वरिष्ठ सलाहकार डाक्टर इब्राहीम कालिन इस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। प्रतिनिधिमंडल का यह ढांचा बहुत कुछ ज़ाहिर करता है।

तुर्की को रूस का एस-400 मिसाइल सिस्टम देने की समय की घोषणा तब की गई जब अमरीका का प्रतिनिधिमंडल अंकारा में मौजूद था और तुर्क नेतृत्व को अमरीका से पैट्रियट मिसाइल सिस्टम का नया वर्जन ख़रीदने के लिए मनाने की कोशिश कर रहा था। यह घोषणा अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प और अमरीकी जनरलों के लिए बहुत बड़ा धचका है।

राष्ट्रपति हसन रूजानी जिन्होंने पुतीन से बंद दरवाज़ों के पीछे मुलाक़ात की इस यात्रा में ईरान के साथ ही सीरिया का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे। पत्रकार सम्मेलन में डाक्टर रूहानी ने जो बातें बयान कीं उनसे साफ़ जाहिर है कि ईरान और सीरिया को कई सफलताएं मिली हैं।

उनका पहला लक्ष्य यह पूरा हुआ कि तीनों देशों ने सीरिया की शांति व स्थिरता तथा अखंडता पर प्रतिबद्धता जताई। दूसरा लक्ष्य यह पूरा हुआ कि सभी सीरियाई शरणार्थियों की स्वदेश वापसी पर ज़ोर दिया गया और स्वदेश वापसी तब होगी जब पूरी तरह संघर्ष विराम हो जाए।

तीसरा लक्ष्य यह पूरा हुआ कि इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सीरिया के भविष्य का फ़ैसला सीरिया की जनता ही करेगी इसका साफ़ मतलब यह है कि राष्ट्रपति बश्शार असद के नेतृत्व में सीरियाई सरकार बाक़ी रहेगी।

अंत में हम यह कहना चाहते हैं कि एक नया सुरक्षा व सामरिक एलायंस उभर रहा है जो नैटो का प्रतिस्पर्धी और वार्सा संधि का उत्तराधिकारी बन सकता है अलबत्ता इस नए एलायंस में शीया सुन्नी और आर्थोडाक्स ईसाई तीनों रंग शामिल हैं यही बहुलता शायद इस एलायंस की मज़बूती का महत्वपूर्ण कारण है। विशेषकर इस समय जब अमरीका की युद्धोन्मादी सरकार माइक पोम्पियो को विदेश मंत्री और जान बोल्टन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाए जाने के बाद अपना प्रारूप पूरा कर चुकी है तो युद्ध की संभावना भी बढ़ गई है।

अंकारा में होने वाली शिखर बैठक तीन महारथियों की बैठक थी जो अपना एजेंडा बड़े ठोस अंदाज़ में लागू करते हैं।