Home विचार ‘हज़रत महल’ अवध की वह बेगम जिसने थामी थी 1857 क्राँति की...

‘हज़रत महल’ अवध की वह बेगम जिसने थामी थी 1857 क्राँति की आग

65
SHARE

हफ़ीज़ किदवई 

कुछ तारीख़ें सिर्फ़ तारीख़ भर नही होती बल्कि पूरे एक ज़माने का ढलना होती है। आज वही 7 अप्रैल है । जब अवध की शान और ताक़त मोहम्मदी खानम यानि बेग़म हज़रत महल दुनिया को छोड़ गई थी। अवध की वह बेगम जिसने लपक कर 1857 क्राँति की आग थामी थी। जिसने लखनऊ में अंग्रेज़ों के झण्डे को दुनिया में सबसे पहले कहीं ज़मीं दोज किया था।

नवाबो के किस्से तो खूब ज़बानों पर हैं, उनके नाज़ुक मिजाज पर तो खूब बाते होती रही हैं मगर उनके ही बीच से उनकी नाज़ों में पली बढ़ी बेगम ने जब क्रांति की सख़्त तपिश सही उसका ज़िक्र कम ही होता है।

बेगम ने हर ओर मोर्चा लिया।सल्तनत की खूबसूरत ठण्डी हवाओं को सख़्त लू के थपेड़ो में बदलते देखा। अपनी नाक के नीचे खड़े पियादों को बदलते देखा। जब ज़मीन की वफ़ादारी की बात आई तो पल पल यही लखनऊ से नेपाल तक वफादारों को बालिश्त बालिश्त भर जागीरों में बिकते हुए देखा।

अवध के नफीस तख्त से काठमांडू की तंग गालियों में ज़िन्दगी से लड़ने वाली मज़बूत,संवेदनशील,सहनशील और जुझारू बेगम का ज़िक्र आज तो कर ही लें।हमे याद है पिछले दिनों हमारी मांगो पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बेगम हज़रत महल यूनिवर्सिटी बनाने का वादा किया था। खैर वादे का क्या, वोह तो होते रहते हैं। मेरी समझ से आज बेगम को मुल्क़ की मज़बूती के लिए याद कीजिये।

अफसोस तो तब होता है जब महिलाओं पर बराबरी और उनको आगे लाने वाले समाजसेवियों के बैनर में बेगम हजऱत महल नही होती हैं। अवध पर जान छिड़कने वालो की ज़बान पर बेगम हज़रत महल नही होती हैं। कवियों,लेखकों की गोष्ठियों में हज़रत महल नही होती हैं।

यही वह हैरतअंगेज़,जुझारू बेगम थी जो बिरतानियो से लड़ती हुई अपने दिल की सुकून गाह से निकली। अवध की खूबसूरत सरज़मीन से रुखसत होकर नेपाल के काठमांडू में आज भी सो रही है। जैसे हम यहाँ सो रहे हैं खामोश।

ज़रा सा बेग़म हज़रत महल को याद कर लीजिये शायद उनका जूझना सुआरत हो जाए।शायद उनका काँटों पर चलना मखमल में बदल जाए। उनके दिल की धड़कन महसूस कीजिये वह आज भी हर बोलने वाले में ज़िंदा हैं।ह र आज़ाद ख्याल में ज़िंदा हैं।