Home विचार ‘पीएम मोदी का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए’

‘पीएम मोदी का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए’

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विकास नारायण राय

हिटलर की टक्कर के आत्मकामी व्यक्तित्व विकार वाले मोदी और ट्रम्प की एक बड़ी दिक्कत है | आज के मीडिया युग में सिर्फ हिटलर होना काफी नहीं, उन्हें अपना गोएबेल्स भी बनना पड़ता है | यानी तानाशाह भी और झूठ की मशीन भी !

कभी बिहार चुनाव के दौर में तक्षशिला को वहीं का बताने वाले मोदी के अब कर्नाटक चुनाव प्रचार में, जवाहर लाल नेहरू की भगत सिंह से शत्रुता जैसा मुद्दा छेड़ने से संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती कि उन्हें चुनावी विजय तो किसी भी कीमत पर चाहिए ही | अन्यथा, 2019 को लेकर उनकी उलटी गिनती अभी से शुरू हो जायेगी | तभी इस बार ‘कर नाटक’ चुनाव प्रचार में उनकी महत्वाकांक्षी इतिहास शून्यता उनकी चुटीली राजनीतिक वक्तृता से भी आगे निकल गयी |

मोदी की हर भाव-भंगिमा पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले एनडीटीवी के रवीश कुमार ने भी मोदी को इतिहास का सबक पढ़ाने का यह मौका नहीं गंवाया | अपने 10 मई के ‘प्राइम टाइम’ का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के भगत सिंह से संबंधों की मोदी की आरोपित व्याख्या को इतिहास संदर्भित करने में लगा दिया |


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रवीश कुमार ने बेशक मोदी उपहास का अपना मंतव्य हासिल कर लिया हो पर क्या मोदी को इतिहास की किसी वस्तुगत समझदारी की जरूरत भी है? मानना चाहिए कि उनके पास अपने सलाहकार भी होंगे और अपने इतिहासकार भी | इन्हीं के दम पर चुनावी सफलता की मंजिलें तय करते हुए वे देश के प्रधानमन्त्री बने बैठे हैं |

मोदी से चिढने वाले उनकी तुलना प्रायः जर्मनी के सार्वकालिक खलनायक, द्वितीय विश्वयुद्ध दौर के तानाशाह, हिटलर से करते आये हैं | जबकि मोदी के प्रशंसक उन्हें अमेरिका के वर्तमान संकीर्ण राष्ट्रवादी राष्ट्रपति ट्रम्प के अवतार में देखने को आतुर रहते हैं | मनोविज्ञानी नजरिये से भी दिलचस्प हैं ये तुलनायें!

हिटलर और ट्रम्प दोनों को ऐतिहासिक यथार्थ से कटा हुआ व्यक्तित्व माना जाता है | दोनों का व्यापक मनोविज्ञानी विश्लेषण भी मिलेगा | होलोकास्ट और विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हिटलर पर तो ऐसी शोध की भरमार है | ट्रम्प के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमेरिकी मीडिया के एक वर्ग की चिंता रही है कि कहीं उनका राष्ट्रपति अपनी सायकायट्रिक दवाएं खाने में कोताही तो नहीं कर रहा ? भारत में नेताओं के ऐसे विश्लेषण का रिवाज नहीं है | हालाँकि, दिलचस्प होगा यदि ऐतिहासिक यथार्थ से कटे नरेंद्र मोदी का भी मनोविज्ञानी नजरिये से मूल्यांकन हो |

हिटलर और उसके गिरोह के नरसंहारों और युद्ध अपराधों का सिलसिला इतना व्यापक और अमानवीय रहा था कि एक प्रमुख मनोविज्ञानी / सायकायट्रिस्ट वर्ग का यहाँ तक मानना है कि उन्हें मनोविज्ञानी मूल्यांकन का विषय बनाना, उनके कृत्यों की आपराधिक विभीषिका को कमतर करने जैसा हो जाएगा | ध्यान रहे कि हिटलर के जीवन काल में उसके मूल्यांकन से जुड़े दो मनोचिकित्सकों को भी आत्महत्या करनी पड़ी थी |

30 नवम्बर 2017 के न्यूयॉर्क टाइम्स में इस शीर्षक से एक चिट्ठी छपी, “The Dangerous Case of Donald Trump: 27 Psychiatrists and Mental Health Experts Assess a President.” इसमें ट्रम्प को यथार्थ से कटा हुआ व्यक्ति बताया गया | साथ ही अपील थी कि क्योंकि ऐसे अन्य तमाम मामलों की तरह राष्ट्रपति को अलग-थलग रख कर मूल्यांकन करना संभव नहीं है, लिहाजा इसका कोई न कोई रास्ता निकाला जाए |

जैसे हिटलर ने ‘यहूदी मुक्त जर्मनी’ और ट्रम्प ने ‘आप्रवासी मुक्त अमेरिका’ को अपना जुनून बना डाला, कुछ उसी राह पर मोदी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ भी चल पड़ा है | ऐतिहासिक यथार्थ से कटने पर कहाँ पहुँचा जा सकता है, यह मोदी गिरोह के रोजाना के नेहरू फोबिया में देखा जा सकता है | सवाल है क्या भारत में मनोविज्ञानी / सायकायट्रिस्ट सचेत मूल्यांकन कर पाने की स्थिति में हैं ?

(अवकाश प्राप्त आईपीएस विकास नारायण राय, हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं।)