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क्या करें अगर पुलिस एफआईआर रजिस्टर करने से करें इनकार ?

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प्रथम सूचना रिपोर्ट या एफआईआर (First Information Report या FIR) एक लिखित प्रपत्र (डॉक्युमेन्ट) है जो भारत, पाकिस्तान, एवं जापान आदि की पुलिस द्वारा किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की सूचना प्राप्त होने पर तैयार किया जाता है. यह सूचना प्रायः अपराध के शिकार व्यक्ति द्वारा पुलिस के पास एक शिकायत के रूप में दर्ज की जाती है. किसी अपराध के बारे में पुलिस को कोई भी व्यक्ति मौखिक या लिखित रूप में सूचित कर सकता है. FIR पुलिस द्वारा तेयार किया हुआ एक दस्तावेज है जिसमे अपराध की सुचना वर्णित होती है . सामान्यत: पुलिस द्वारा अपराध संबंधी अनुसंधान प्रारंभ करने से पूर्व यह पहला कदम अनिवार्य है.

भारत में किसी भी व्यक्ति द्वारा शिकायत के रूप में प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार है.  पीड़ित व्यक्ति, घटना का गवाह, या घटना के ज्ञान वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा यह दर्ज किया जा सकता है.यह जानकारी पुलिस को मौखिक रूप से, लिखित या फोन पर दी जा सकती है.

एक पुलिस अधिकारी को आपके एफआईआर दर्ज कराने से इंकार करने का अधिकार है यदि आप जिस मामले की रिपोर्ट कर रहे हैं वह छोटा है तो.

अपराध जिसके लिए एफआईआर पंजीकृत किया जा सकता है

एक प्राथमिकी केवल पुलिस द्वारा संज्ञेय अपराधों के लिए पंजीकृत की जा सकती है. संज्ञेय अपराध वे हैं जहां पुलिस को वारंट के बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार है. संज्ञेय अपराधों में मर्डर, बलात्कार, चोरी, आक्रमण आदि शामिल हैं. गैर-संज्ञेय अपराधों के लिए, पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती है, ऐसे अपराधों की शिकायत को न्यायिक मजिस्ट्रेट को कार्रवाई के लिए भेजा जाता है.


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पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए जिसमें भौगोलिक सीमाएं या क्षेत्राधिकार अपराध दर्ज होना चाहिए. लेकिन आपात स्थिति के मामले में, किसी भी पुलिस स्टेशन पर एफआईआर दर्ज करने पर कोई बार नहीं है और फिर उसे आवश्यक अधिकार क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर दिया जाता है. कॉल या ईमेल के माध्यम से एक तत्काल प्राथमिकी भी पंजीकृत की जा सकती है. इसके अलावा, दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर http://www.elhiphipolice.nic.in/register.html भी एक प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है

एक बार प्राथमिकी दर्ज हो जाने पर पुलिस को मामले की जांच करनी होगी, गवाहों के रिकॉर्ड स्टेटमेंट्स और अंतिम रिपोर्ट दर्ज करनी होगी. पुलिस हिरासत में एक कबुली अदालत में सबूत के रूप में स्वीकार्य नहीं है, हालांकि, पुलिस की अंतिम रिपोर्ट अदालत के विचार में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है.

अगर पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज कराने से इंकार कर देती है

फिर आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 154 (3) के अनुसार आपको डाकघर द्वारा पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त को लिखित भेजने का अधिकार है. अगर पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त का मानना ​​है कि यह एक संज्ञेय अपराध की रिपोर्ट करता है जिस पर कार्रवाई की जानी चाहिए तो वह अपराध की संज्ञान ले सकता है और पुलिस को जांच के साथ आगे बढ़ने के लिए निर्देशित कर सकता है.

लेकिन अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर एस.पी. , डी.आई.जी या रेंज आई.जी को दे सकते है , जिस पर उक्त अधिकारी उचित कार्रवाई कर सकता है. फिर भी अगर एफ.आई.आर(F.I.R) न लिखी जाये तो आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा – निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन 156(3) के तहत दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफ.आई.आर(F.I.R) की कॉपी उपलब्ध कराई जाए. यदि फिर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता , तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है.

अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है. इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए. इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सी.आर.पी.सी (C.R.P.C)की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है.

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